लपटों से निकलते सवाल

दिले, मुंबई जैसे महानगरों में पिछले एक-दो साल में जितने बड़े अग्निकांड हुए हैं उनसे यही साबित हुआ है कि चंद लापरवाहियों के चलते हम आग के आगे बेहद लाचार बन गए हैं। मर्ज आग की ताकत बढ़ जाना नहीं, बल्कि यह है कि आग से सुरक्षा के जितने आय जरूरी हैं, शहरीकरण की आंधी और अनियोजित विकास-नियोजन की नीतियों ने न पायों को हाशिये पर धकेल दिया है। शहरों में आग की घटनाएं गंभीर समस्या बन गई हैं। तमाम लापरवाहियों और कायदे-कानून की अनदेखी ने आग को हमारे विनाश के हथियार में तब्दील कर बला हैं। हाल में देश की राजधानी दिल्ली के एक होटल में आग ने सत्रह जिंदगियां लील लीं। यह बड़े अचरज की बात है कि कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके दुनिया के तमाम आधुनिक शहर आग को न्योता दे रहे हैं। एक के बाद एक होने वाले शहरी अग्निकांडे पर कोई लगाम नहीं लग पा रही है। दिल्ले के होटल का दर्दनाक हादसा मालूम नहीं कि कितने दिनों तक हमारे जेहन में जिंदा रहेगा, क्योंकि हो सकता है कि तब तक उससे भी भीषण कोई नया अग्निकांड हमारी स्मृतियों पर हावी हो जाए। नए हों या पुराने, दुनिया भर के तमाम शहरों में लपटों से आग से महफूज़ बनाने वाले पायों पर तभी कुछ नजर जाती है, जब वहां की इमारतों में कोई बड़ हादसा हो चुका होता है। असल में, कथित विकास के नाम पर वास्तविक जंगलों से शहरों के कंक्रीट के जंगलों में पहुंचीं मानव सभ्यता के लिए आज आग उसकी ताकत के उलट कमजोरी साबित हो रहीं हैं। दिले, मुंबई जैसे महानगरों में पिछले एक-दो साल में जितने बड़े अग्निकांड हुए हैं उनसे यही साबित हुआ है कि चंद लापरवाहियों के चलते हम आग के आगे बेहद लाचार बन गए हैंमर्ज आग की ताकत बढ़ जाना नहीं, बल्कि यह है कि आग से सुरक्षा के जितने आय जरूरी हैं, शहरीकरण की आधी और अनियोजित विकास-नियोजन की नीतियों ने न पायों को हाशिये पर धकेल दिया है। विडंबना यह है कि शहरीकरण के सारे कायदों को धता बताते हुए जो कथित विकास हमारे देश या बाकी दुनिया में हो रहा है और जिसके तहत रिहाइश ही नहीं, होटलों, पब, विभिन्न संस्थाओं और अस्पतालों के लिए ऊंची इमारतों के निर्माण का जो काम देश में हो रहा है, उसमें जरूरी सावधानियों की तरफ न तो शहरी प्रबंधन की नजर हैं और न हीं न संस्थाओं-विभागों को इसकी कोई फिक्र है जिन पर शहरों में आग से बचाव के कायदे बनाने और उन पर अमल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है। असल में, आधुनिक वक्त के निर्माण का जो सबसे चिंताजनक पहलू इधर कुछ वर्षों में सामने आया है, वह यह हैं कि इमारतें बाहर से तो लकदक दिखाई देती हैं, लेकिन उनके अंदर मामूली चिंगारियों को हवा देकर भीषण अग्निकांडे में बदल देने वाली इतनी चीजें मौजूद रहती हैं कि एक बार कहीं कोई बिजली का तार भी सुलगता है तो वह भयानक हादसे का कारण बन जाता है। दिल्ले के होटल में लगी आग की शुरुआत इसके एक कमरे में ब्लोअर को शुरू करने और उसमें हुए शॉर्ट सर्किट से बताई जा रही है। ज्यादातर मामलों में आग किसी बेहद छेटे कारण से ही शुरू होती है। यह बात कई सौ साल पहले समझ में आ गई थी। पर अफसोस है कि ऐसी मामूली वजहों की असरदार रोकथाम अब तक नहीं हो सकी। जैसे, सन 1666 में लंदन की आग 'गेट फायर ऑफ लंदन के बारे में कहा जाता हैकि वह लंदन की पुडिंग लेन स्थित एक छोये बेकरी शॉप में शुरू हुई थीं। इसी तरह अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित ऑकलैंड वेयरहाउस में एक निकलते आयोजन के दौरान लगी आग एक रेफ्रिजरेटर की देन बताई जाती हैं। आज की आधुनिक रसोइयों में रखे फिज-माइक्रोवेव से लेकर एसी, कंप्यूटर जैसे अकरण और फाल्स सीलिंग के भीतर की जाने वाली वायरिंग महज एक शॉर्ट सर्किट के बाद काबू नहीं किए जा सकने वाले आग के शोले पैदा कर रही हैं। दिक्कत यह है कि आधुनिक शहरीकरण की जो मुहिम पूरी दुनिया में चल रही है, उसमें सावधानियों और आग से बचाव के आयों पर ज्यादा काम नहीं किया गया है। आज इमारतें ऐसी निर्माण सामग्री से बन रही है जिसमें आग को न्योता देने वाली तमाम चीजों का इस्तेमाल होता है। आंतरिक साज- सज्जा के नाम पर फर्श और दीवारों पर लगाई जाने वाली सुखी लकडे, आग के प्रति बेहद संवेदनशील रसायनों से युक्त पेंट, रेफ्रिजरेटर, इनवर्टर, माइक्रोवेव, गैस का चूल्हा, चिमनी, एयर कंडीशनर, टीवी और सबसे प्रमुख पूरी इमारत की दीवारों के भीतर बिजली के तारों का संजाल है जो शॉर्ट सर्किट की सूरत में लेटी-सी आग को बड़े हादसे में बदल बलते हैं। इन सभी चीजों को आग से बचाने के इंतजाम भी प्रायः या तो किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, जैसे एमसीबी आदि के निकलते सवाल हवाले होते हैं या फिर फायर अलार्म के सहारे जो अक्सर ऐसी सूरत में काम करते नहीं मिलते हैं क्योंकि उनकी समय-समय पर जांच नहीं होती। दूसरा बड़ा संकट तंग रास्तों के किनारे पर ऊंची इमारतें बनाने के चलन ने पैदा किया है। ऐसी ज्यादातर इमारतों में शायद ही इसकी गंभीरता से जांच होती हो कि यदि कभी अचानक आग लग जाई तो क्या बचाव के साधन आसपास मौजूद हैंकोई आपात स्थिति पैदा हो तो वहां निकासी का रास्ता क्या है, क्या वहां मौजूद लोगों को समय पर चेतावनी देने की प्रणाली काम कर रही है। दिल्ले के होटल में आग की घटना के पीछे ये सारे कारण गिनाए जा रहे हैं। कुछ और अहम बातें भी हैं जो शहरों में आग को विनाशकारी ताकत दे रही हैं। जैसे, तकरीबन हर बड़े शहर में बिना यह जाने ऊंची इमारतों के निर्माण की इजाजत दे दी गई है कि क्या उन शहरों के दमकल विभाग के पास जरूरत पड़ने पर न इमारतों की छत तक पहुंचने वाली सीढ़ियां (स्काईलफ्ट) मौजूद हैं या नहींदिल्लं में दमकल विभाग के पास अधिकतम चालीस मीटर ऊंची स्काईलिफ्टें हैं, पर यहां इमारतों की ऊंचाई सौ मीटर तक पहुंच चुकी हैंयही हाल, इसके एनसीआर इलाके का है। नोएछ में भी अधिकतम बयालीस मीटर ऊंची स्काईलिफ्ट अलब्ध है, पर यहां जो करीब दो हजार गगनचुंबी इमारतें हैं या जिनका निमणि चल रहा हैं, उनमें से कुछ की ऊंचाई तीन सौं मीटर तक है (निर्माणाधीन यवरसुपरनोवा 300 मीटर ऊंचा होगा। लगभग यही हाल देश के दूसरे बड़े शहरों में हैं। कहने को तो देश के किसी भी हिस्से में कोई संस्था, फैक्टरी इत्यादि अग्निशमन विभाग की तरफ से मिले अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) के बिना नहीं चल सकती। यह एनओसी भी हें सीधे नहीं मिलता। दिल्ले में अग्निशमन विभाग को जब एमसीडें, एनडीएमसी या अन्य संबंधित एजेंसियों से इसका आवदेन मिलता हैं, तो वे न फैक्ट्रियों या संस्थानों की इमारतों में जाते हैं और जांच करने के बाद संतुष्ट होने पर एनओसी जारी करते हैं। लेकिन सभी जानते हैं कि इस प्रावधान की अनदेखीं होती हैं। बताया तो यह भी जाता है कि इन विभागों के कर्मचारियों को पता भी रहता है कि किस संस्था या फैक्ट्री में कौन-सा काम हो रहा है, लेकिन मिलीभगत कर सारी धांधलेबाजों की ओर से आंखें मुंद ली जाती हैं।


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