स्वामी आत्मानंद की जयंती 27 अगस्त पर विशेष लेख (26पीआर02यूए)


रायपुर। स्वामी आत्मानंद का जन्म रायपुर जिले के बरबंदा गांव में 6 अक्टूबर 1929 को हुआ। सन् 1957 में रामकृष्ण मिशन के महाध्यक्ष स्वामी शंकरानंद ने तुलेन्द्र की प्रतिभा, विलक्षणता, सेवा और समर्पण से प्रभावित होकर ब्रम्हचर्य में दीक्षित किया और उन्हें नया नाम दिया, स्वामी तेज चौतन्य।


स्वामी तेज चौतन्य ने अपने नाम के ही अनुरूप अपनी प्रतिभा और ज्ञान के तेज से मिशन को आलोकित किया। अपने आप में निरंतर विकास और साधना सिद्धि के लिए वे हिमालय स्थित स्वर्गाश्रम में एक वर्ष तक कठिन साधना कर वापस रायपुर आए। स्वामी भास्करेश्वरानंद के सानिध्य में उन्होंने संस्कार की शिक्षा ग्रहण की, यहीं पर उन्हें स्वामी आत्मानंद का नाम मिला।



स्वामी आत्मानंद के पिता धनीराम वर्मा बरबंदा गांव के पास के स्कूल में शिक्षक थे। उनकी माता श्रीमती भाग्यवती देवी गृहणी थी। पिता धनीराम वर्मा ने शिक्षा क्षेत्र में उच्च प्रशिक्षण के लिए बुनियादी प्रशिक्षण केन्द्र वर्धा में प्रवेश ले लिया और परिवार सहित वर्धा आ गए।


वर्धा आकर धनीराम जी महात्मा गांधी जी के सेवा ग्राम आश्रम में अक्सर आने लगे। बालक तुलेन्द्र भी पिता के साथ सेवा ग्राम जाने लगा। बचपन से तुलेन्द्र गीत और भजन कर्णप्रिय स्वर में गाते थे। जिसके कारण गांधी जी उनसे स्नेह करते थे। गांधी जी उन्हें अपने साथ बैठाकर उनसे गीत सुनते थे। धीरे-धीरे तुलेन्द्र को गांधी जी का विशेष स्नेह प्राप्त हुआ। गांधी जी जब तुलेन्द्र के साथ आश्रम में घूमते थे तब वे उनकी लाठी उठाकर आगे-आगे दौड़ते थे और गांधी जी पीछे-पीछे लम्बे-लम्बे डग भरते अपने चिर-परिचित अंदाज में चलते थे।


गांधी जी की लाठी लेकर आगे चलते हुए एक बच्चे की तस्वीर को कई अवसरों पर आपने देखी होगी। हमारे स्मृति पटल में वह चित्र गहरे से अंकित है, यह चित्र हम सभी को याद होगा। इस चित्र में गांधी जी की लाठी को लेकर आगे-आगे चलता बच्चा तब का रामेश्वर उर्फ तुलेन्द्र वर्मा और आज के स्वामी आत्मानंद जी है। स्वामी आत्मानंद जी ने छत्तीसगढ़ में मानव सेवा एवं शिक्षा संस्कार का अलख जगायी। शहरी और आदिवासी क्षेत्र में बच्चों में तेजस्विता का संस्कार, युवकों में सेवाभाव तथा बुजुर्गों में आत्मिक संतोष का संचार किया।



वर्धा आश्रम से धनीराम वर्मा कुछ वर्ष बाद रायपुर वापस आ गए और रायपुर में 1943 में श्रीराम स्टोर नामक दुकान खोलकर जीवन यापन करने लगे। बालक तुलेन्द्र ने सेन्टपॉल स्कूल में प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल की परीक्षा पास की और उच्च शिक्षा के लिए साइंस कॉलेज नागपुर चले गए। वहां उन्हें कॉलेज में छात्रावास उपलब्ध नहीं होने के फलस्वरूप वे रामकृष्ण आश्रम में रहने लगे। यहीं से उनके मन में स्वामी विवेकानंद के आदर्शों ने प्रवेश किया। बाद में उन्हें कॉलेज में छात्रावास उपलब्ध करा दिया गया, पर तब तक विवेक ज्योति ने उनके हृदय में प्रवेश कर परम आलोक फैला दिया था। तुलेन्द्र ने नागपुर से प्रथम श्रेणी में एम.एससी. गणित की परीक्षा उत्तीर्ण की उसके बाद दोस्तों की सलाह पर आई.ए.एस. की परीक्षा में शामिल हुए। वहां उन्होंने प्रथम दस सफल उम्मीदवारों में स्थान प्राप्त किया, पर मानव सेवा और विवेक दर्शन से आलोकित तुलेन्द्र नौकरी से विलग रहते हुए, मौखिक परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए। वे रामकृष्ण आश्रम की विचारधारा से जुड़कर कठिन साधना और स्वाध्याय में रम गए।
स्वामी जी छत्तीसगढ़ की सेवा में इस कदर ब्रम्हानंद में लीन हुए कि मंदिर निर्माण के लिए प्राप्त राशि अकाल ग्रस्त ग्रामीणों को बांट दी। बांग्लादेश से आए शरणार्थियों की सेवा, शिक्षा के लिए सतत प्रयास, कुष्ठ उन्मूलन आदि समाजहित के कार्य जी-जान से जुटकर करते रहे। शासन के अनुरोध पर उन्होंने वनवासियों के उत्थान के लिए नारायणपुर में उच्च स्तरीय शिक्षा केन्द्र की स्थापना की।


इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में शिक्षा, संस्कार, युवा उत्थान और प्रेरणा के दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में चारों ओर छा गए। छत्तीसगढ़ को सुसंस्कृत करने के लिए कृत संकल्पित इस युवा संत को 27 अगस्त 1989 को भोपाल से सड़क मार्ग द्वारा रायपुर आते हुए राजनांदगांव के समीप एक दुर्घटना में हम से सदा-सदा के लिए छीन लिया।



स्वामी विवेकानंद के रायपुर प्रवास को अविस्मरणीय बनाने के उद्देश्य से उन्होंने रायपुर में विवेकानंद आश्रम बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया। इस कार्य के लिए उन्होंने मिशन से विधिवत स्वीकृति नहीं मिली, किन्तु वे इस प्रयास में सफल रहे और आश्रम निर्माण के साथ ही रामकृष्ण मिशन बेलूर मठ से संबद्धता भी प्राप्त हो गई। हम आज जिस विवेकानंद आश्रम का भव्य और मानवतावादी स्वरूप देख रहे है, वह स्वामी तेज चौतन्य की लगन एवं निष्ठा का प्रतिफल है, जिन्हें बाद में स्वामी आत्मानंद के नाम से पुकारा गया।



स्वामी जी ने आदिवासियों के सम्मान और उनकी उपज का वाजिब मूल्य दिलाने के लिए अबुझमाड़ प्रकल्प की स्थापना की। नारायणपुर में वनवासी सेवा केन्द्र प्रारंभ कर वनवासियों की दशा और दिशा सुधारने के प्रयास हुए। खेती के साथ-साथ पेयजल, शिक्षा, चिकित्सा के कार्य भी होने लगे। वनवासी विद्यार्थियों के लिए आवासीय विद्यालय के साथ अन्य विद्यालय के निर्माण और छात्रावास के निर्माण भी किए गए।


इसके लिए यूनिसेफ से आर्थिक मदद भी मिली। नागपुर में सेवा संस्थान के शुभारंभ भी किया। यहां अध्ययन करने वाले विद्यार्थी बड़े-बड़े प्रशासनिक पदों पर चयनित भी हुए और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया । प्रदेश सरकार स्वामी आत्मानंद के आदर्शों और विचारों के अनुरूप अनुसचित जाति, जनजातिय क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक उन्नति के लिए विशेष ध्यान दे रही है।


स्वामी जी के विचारों के अनुरूप किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने का फैसला लिया और पूरे प्रदेश में ढाई हजार रूपए क्विंटल में धान खरीदी की व्यवस्था की। किसानों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कर्जमाफी की। सरकार वनवासियों के कल्याण के लिए कार्य कर रही है।


गांव के हाट-बाजारों में मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लिनिक योजना के माध्यम से चिकित्सीय परीक्षण और निःशुल्क दवाई वितरण का कार्य कर रही। इसी प्रकार कुपोषण दूर करने के लिए महिला समूहों और पंचायतों के माध्यम से गरम भोजन वितरण की योजना भी शुरू की गई है। यह दोनों महात्वाकांक्षी योजनाएं गांधी जयंती के दिन आगामी 2 अक्टूबर से पूरे प्रदेश में लागू की जा रही हैं।


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